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आयुर्वेद के जनक कौन है?

आइये जानते हैं आयुर्वेद के जनक कौन है (ayurved ke janak kaun the)। आयुर्वेद की महत्ता और उपयोगिता से जुड़ी थोड़ी जानकारी आपके पास जरूर होगी लेकिन अगर आप आयुर्वेद और उसके जनक से जुड़ी ज्यादा जानकारी लेना चाहते हैं तो आपको ये लेख जरुर पढ़ना चाहिए जिसमें आज हम आयुर्वेद की प्राचीनता और इसके जनक से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें करने वाले हैं। तो चलिए, जानते हैं आयुर्वेद और इसके जनक के बारे में।

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। इसका अर्थ होता है- ‘जीवन का अमृत रूपी ज्ञान।’ ये भारतीय आयुर्विज्ञान (ayurvigyan) है जो विज्ञान की ऐसी शाखा है जो मानव के शरीर को निरोगी रखने, रोग होने पर रोग मुक्त करने और मानव की आयु बढ़ाने से सम्बंधित है।

चरक, सुश्रुत और काश्यप जैसे महान ग्रंथकारों के अनुसार आयुर्वेद अथर्ववेद (atharva veda) का उपवेद है। इस आधार पर ये माना जाता है कि आयुर्वेद का रचनाकाल ईसा पूर्व 3,000 से 50,000 वर्ष पहले का रहा होगा यानी सृष्टि की उत्पत्ति के आसपास ही अथर्ववेद की रचना हुयी होगी।

आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ये चिकित्सा पद्धति देवताओं की है। जब देवताओं से ये निवेदन किया गया कि इस तरह की अद्भुत चिकित्सा पद्धति से मानव का भी कल्याण होना चाहिए तब मानव कल्याण के लिए इसका ज्ञान देवताओं के वैद्य द्वारा धरती के महान आचार्यों को दिया गया। आइये, अब जानते हैं आयुर्वेद के जनक के बारे में।

आयुर्वेद के जनक कौन है? (ayurved ke janak kaun the)

आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि हैं जो आरोग्य, सेहत और तेज के देवता हैं। धन्वन्तरि महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, भगवान धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अवतार हैं जिनका धरती पर अवतरण समुद्र मंथन के समय त्रयोदशी के दिन हुआ इसलिए दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस को भगवान धन्वन्तरि का जन्म मनाया जाता है। इसी दिन धन्वन्तरि भगवान ने आयुर्वेद को प्रकट किया था।

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आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि की चार भुजाएं हैं जिनमें शंख, चक्र, जलूका, औषध और अमृत कलश है। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी और इन्हें आयुर्वेद की चिकित्सा (ayurved chikitsa) करने वाले वैद्य ‘आरोग्य का देवता’ कहते हैं।

ऐसा माना जाता है कि समुद्रमंथन से निकले कलश से अंड रुप में धन्वंतरि प्रकट हुए थे, जिन्हें उस समय संसार में कोई स्थान प्राप्त नहीं हुआ लेकिन भगवान विष्णु ने कहा कि ‘तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियां प्राप्त होंगी और उसी शरीर से देवत्व की प्राप्ति भी होगी। तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन करोगे और द्वितीय द्वापर युग में तुम पुनः जन्म लोगे।’ भगवान विष्णु के इस वर के बाद धन्वन्तरि ने काशी के महाराज धन्व के पुत्र के रुप में जन्म लिया।

वैदिक काल में जो स्थान अश्विनी को प्राप्त हुआ था, वही स्थान पौराणिक काल में धन्वन्तरि को प्राप्त हुआ। अश्विनी के हाथ में मधुकलश था और धन्वन्तरि के हाथ में अमृत कलश था ताकि विष्णु के अंश धन्वन्तरि रोगों से रक्षा कर सकें क्योंकि विष्णु संसार के रक्षक हैं।

वर्तमान में आयुर्वेद के मूल ग्रन्थ के रुप में धन्वन्तरि संहिता ही पायी जाती है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत ने इस शास्त्र का उपदेश धन्वन्तरि से ही प्राप्त किया था जिसे बाद में चरक महर्षि आदि ने आगे बढ़ाया।

दोस्तों, इस लेख में आपको आयुर्वेद जैसी महान चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जरूर मिली होगी। जागरूक टीम को उम्मीद है आयुर्वेद का जनक किसे कहा जाता है (ayurvedic aushadhi ke janak kaun the) कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और रोचक भी लगी होगी।

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