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क्रायोजेनिक तकनीक क्या है?

क्रायोजेनिक तकनीक को निम्नतापकी कहा जाता है। क्रायो एक यूनानी शब्द ‘क्रायोस’ से बना है और इसका अर्थ होता है बर्फ जैसा ठंडा। इस तकनीक में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का प्रयोग किया जाता है। रॉकेटों में ईंधन को तरल अवस्था में प्राप्त करने के लिए क्रायोजेनिक तकनीक का ही इस्तेमाल किया जाता है।

माइनस 238 डिग्री फॉरेनहाइट (−238 °F) को क्रायोजेनिक तापमान कहा जाता है। इसी तापमान का उपयोग करने वाली प्रक्रियायों और उपायों का क्रायोजेनिक इंजीनियरिंग के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।

इस तापमान पर क्रायोजेनिक इंजन के ईंधन में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस तरल अवस्था में आ जाती हैं। इस लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन को क्रायोजेनिक इंजन में जलाया जाता है।

लिक्विड ईंधन जलने से इतनी मात्रा में ऊर्जा निकलती है जिससे क्रायोजेनिक इंजन को 4.4 किलोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड मिल जाती है। इस इंजन में बहुत ठण्डी और वाष्पीकृत गैसों को ईंधन और ऑक्सीकारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

इस तकनीक का विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ और आसानी से मिलने वाली ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में सबसे बेहतर पाया गया।

इन दोनों ही गैसों का इस्तेमाल ईंधन में गैस रूप में नहीं हो सकता था क्योंकि ऐसा करने पर इन गैसों को रखने के लिए इंजन को बड़ा बनाना पड़ता जबकि रॉकेट को उड़ाने के लिए इंजन का छोटा होना बहुत ही जरुरी होता है।

क्रायोजेनिक इंजन के टरबाइन और पम्प ईंधन और ऑक्सीकारक को दहन कक्ष तक पहुंचाते हैं। इस टरबाइन और पंप को भी ख़ास किस्म की मिश्रधातु से बनाया जाता है।

इसके अलावा दहन से पहले ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैसों को सही अनुपात में मिलाना, सही समय पर दहन शुरू करना, उनके दबावों को नियंत्रित करना और पूरे सिस्टम को गर्म होने से रोकना जैसी गतिविधियां करनी होती है।

ख़ास बात ये है कि जीएसएलवी रॉकेट को केवल क्रायोजेनिक इंजन से ही प्रक्षेपित किया जा सकता है और इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले देशों में भारत का नाम भी शामिल हो चुका है।

उम्मीद है जागरूक पर क्रायोजेनिक तकनीक क्या है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

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