गीता का सबसे प्रमुख उपदेश क्या है?

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आइये जागरूक पर जानते हैं गीता का सबसे प्रमुख उपदेश क्या है। गीता में ज्ञान को सर्वोच्च रखा गया है और इसमें ना केवल अर्जुन की दुविधा को दूर किया गया है बल्कि मोह और अज्ञान से ग्रस्त हर मनुष्य को जीवन में कर्तव्य की सर्वोच्चता का ज्ञान कराया गया है। गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन और समस्त मानव जाति को कर्म की प्रधानता का महत्त्व बताया है। ऐसे में आपको भी गीता के इस महान उपदेश के बारे में जरूर जानना चाहिए इसलिए आज आपको गीता में दिए गए कर्मयोग के उपदेश की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।

गीता का सबसे प्रमुख उपदेश क्या है?

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

ये श्लोक आपने जरूर सुना होगा। ये गीता के दूसरे अध्याय सांख्य योग का श्लोक है जो अर्जुन और समस्त मानव जाति को कर्म की प्रधानता का सन्देश देता है। इस श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि तेरा कर्म करने का ही अधिकार है, उसके फलों में तेरा अधिकार नहीं है इसलिए तू फल की इच्छा में कर्म मत कर और ना ही ऐसा सोच कि फल की आशा किये बिना मैं कर्म क्यों करूँ।

इस श्लोक में चार तत्व हैं – कर्म करना तेरे हाथ में है, कर्म का फल किसी और के हाथ में है, कर्म करते समय फल की इच्छा मत कर, फल की इच्छा छोड़ने का अर्थ ये नहीं है कि तू कर्म करना ही छोड़ दे।

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

गीता के दूसरे अध्याय के इस श्लोक में श्रीकृष्ण ये उपदेश देते हैं कि कामना, सफलता और विफलता को एक समान मानकर मनुष्य को अपने कर्म के प्रति एकाग्र रहना चाहिए। कर्म का फल मिले या न मिले, दोनों ही स्थितियों में जब मनुष्य का मन एक समान रहता है तब उसी स्थिति को कर्मयोग कहा जाता है। कर्म में कुशलता और गुणवत्ता ही योग है। कर्म बंधन रहित होने चाहिए। जो कर्म निष्काम भाव से ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से किए जाते हैं, ऐसे कर्म मनुष्य के लिए बंधन उत्पन्न नहीं करते बल्कि मोक्ष की प्राप्ति में सहायक बनते हैं।

गीता के तीसरे अध्याय का नाम कर्मयोग है जिसमें श्री कृष्ण निष्काम कर्म को कर्मयोग की श्रेणी में बताते हैं और निष्काम कर्म को यज्ञ का रुप देते हैं। चौथे अध्याय में कर्मों के भेद बताये गए हैं।

इस प्रकार गीता के सभी उपदेशों में कर्म की प्रधानता और महत्ता को बताया गया है और ये उपदेश ना केवल महाभारत काल में युद्ध में विचलित अर्जुन को अपने अंतर्द्वंद से बाहर निकालने में समर्थ हुआ बल्कि आज भी हर व्यक्ति को बिना फल की इच्छा रखे,एकाग्रता से कर्म करने की प्रेरणा देता है।

दोस्तों, गीता के इस उपदेश को हम सभी को अपने जीवन में उतारना चाहिए ताकि हमारा जीवन कर्म प्रधान बन सके और फल की इच्छा से उत्पन्न होने वाले दुःख से भी स्वतंत्र हो सके।

जागरूक टीम को उम्मीद है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए उपयोगी भी साबित होगी।

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‘​​कर्मण्येवाधिकारस्ते मां लेषु कदाचन’ अर्थात कर्म योग