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महात्मा गाँधी – जीवन परिचय

भारत माता को अंग्रेज़ो की गुलामी के चंगुल से मुक्त कराने में महात्मा गाँधी का अविस्मरणीय योगदान है। महात्मा गाँधी ने अपना सम्पुर्ण जीवन देश हित में न्योछावर कर दिया। इन्ही की प्रेरणा और त्याग से ही 15 अगस्त 1947 को भारत देश आज़ाद हुआ। गाँधी जी के दृढ़ निश्चय और दृढ़ विश्वास से ही हम आज़ादी की लड़ाई लड़ सके। वो सत्यभाषी थे और उनका कहना था – “विश्व के सभी धर्म भले ही और चीज़ो में अंतर रखते हो, लेकिन सभी इस बात पर एकमत है की दुनिया में कुछ नही बस सत्य जीवित रहता है।”

गाँधी जी के पिता जी कर्मचंद गाँधी राजकोट के दीवान थे और उनकी माँ पुतली बाई एक धार्मिक महिला थी। सत्य और अहिंसा का पाठ उन्हे अपनी माँ से ही मिला। गाँधी जी का जन्म गुजरात के एक छोटे से गाँव पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गाँधी था।

उन्होने सत्रह वर्ष की उम्र मैं मेट्रिक पास की, उसके बाद उन्होने क़ानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लेंड जाने का निश्चय किया |वहाँ से वो बेरिस्टर बनकर लौटे। आगे की प्रेक्टिस उन्होने मुंबई में की। इनका विवाह कस्तूरबा जी से हुआ, वो बहुत ही शांत व सरल स्वभाव की महिला थी।

गाँधी जी को दक्षिण अफ्रीका किसी केस के सिलसिले में जाना पड़ा। वहाँ रहते हुए उन्होने भारतीयो पर हो रहे अत्याचारो और रंग-भेद नीति को समाप्त करने के लिए लड़ाई लड़ी। वो अपने उसुलो पर डटे रहे। वहाँ के लोग उनसे बहुत प्रभावित हुऐ। नेल्सन मंडेला ने उन्हे शांति दूत कहा और उनके कार्यो की बहुत सराहना की। दक्षिण अफ्रीका से आने के पश्‍चात उन्होने स्वतंत्रता को अपने जीवन का एक मात्र लक्ष्य बनाया।

उन्होने सत्य और अहिंसा की राह पर चलते हुए कई आंदोलन किए, जिसे सत्याग्रह नाम दिया गया। उन आंदोलनो में मुख्य थे।

चंपारण सत्याग्रह – सर्वप्रथम बिहार के चंपारण जिले से 1913 में सत्याग्रह की शुरुआत हुई। यहाँ पर अंग्रेज़ो ने किसानो को नील की खेती करने को मजबूर किया। वो किसानो से कोडियो के भाव नील खरीदते थे। उन्होने वहाँ किसानो से ज़मीन हड़प कर अपनी कोठिया बनवा ली। सभी किसान वर्ग इससे ख़ासा परेशान थे। अतः गाँधी तथा उनके साथियों के साथ मिलकर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जिसके निर्णय को सभी पक्षो ने स्वीकार किया ओर इसको समाप्त किया।

खेड़ा सत्याग्रह – गुजरात के खेड़ा जिले में सन 1917 में अति वृष्टि के कारण सारी फसल नष्ट हो गयी और भुखमरी की स्थिति आ गयी। ऐसी कठिन परिस्थति में खेड़ा किसानो ने सरकार से निवेदन किया की इस वर्ष उनका कर माफ़ किया जाए। किंतु अँग्रेज़ी सरकार ने उनकी एक नही सुनी। परेशान होकर किसान गाँधी जी के पास गये। गाँधी जी ने गाँव-गाँव घूमकर किसानो को हर परिस्थति में शांति बनाए रखने के लिए निवेदन किया। गाँधी जी के कहे अनुसार खेड़ा किसानो ने पूरे आंदोलन में शांति तथा साहस का परिचय दिया। परिणामवश मजबूर होकर सरकार को किसानो की बात माननी पड़ी। इस तरह सभी किसानो को अपनी एकता की शक्ति का अहसास हुआ।

बारदोली सत्याग्रह – बारदोली सत्याग्रह का प्रमुख कारण लगान में अचानक 30% की बढ़त होना था। इस बढ़े हुए लगान के कारण किसानो में आक्रोश फैल गया। बारदोली सत्याग्रह के चलते गाँधी जी की घोषणा पर पूरे देश में बारदोली दिवस मनाया गया। इस आंदोलन का असर अंग्रेज सरकार पर हुआ और वायसराय के कहने पर मुंबई सरकार ने लगान के आदेश को रद कर दिया। इसमे भी उन्हे सफलता मिली।

इन आंदोलनो के चलते वो कई बार जेल गये और कई बार अनशन भी करना पड़ा। लेकिन उन्होने सत्य और अहिंसा का मार्ग कभी नही छोड़ा। गाँधी जी अहिंसा के पुजारी थे और उनका कहना था – “आँख के बदले आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी”।

उन्होने खादी को बढ़ावा देने को कहा और उन्होने इसके लिए उन्होने “चरखा संघ” की स्थापना की। इसके लिए गाँव-गाँव, शहर -शहर घूमकर धन एकत्रित किया और खादी के उपयोग पर ज़ोर दिया। आज भी खादी उधोग काफ़ी प्रचलित है – इसमे बहुत से ह्स्त निर्मित उत्पादन है जो प्रचलन में है। खादी उद्योग की स्थापना 1920 में की गयी, इसकी स्थापना का उदेश्य आज़ादी की लड़ाई के लिए अंग्रेज सरकार के खिलाफ एक योजना थी जिसमें सफलता भी मिली। आज सिर्फ़ देश में ही नही अपितु विदेशों में भी खादी को बहुत पसंद किया जाता है।

“देश के लिए जिसने विलास को ठुकराया था,
त्याग विदेशी धागे उसने खुद ही खादी बनाया था,
पहन काठ के चप्पल जिसने सत्याग्रह का राग सुनाया था,
देश का था वो अनमोल दीपक जो महात्मा कहलाया था।

लॉर्ड माउंट बेटन ने उन्हे युग पुरुष कहा और साथ ही यह भी कहा की भविष्य में इनके जैसा महापुरुष शायद ही कोई दूसरा होगा। गाँधी जी के ही अथक प्रयास और सूझ-बुझ से ही हमें 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। स्वतंत्रता मिलने के कुछ समय पश्चात 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर इनकी हत्या कर दी।

बापू का मानना था की “स्वंय को जानने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, स्वंय को दूसरों की सेवा में डूबा देना” और उन्होने आजीवन यही किया, अपना अमूल्य जीवन देश की सेवा मैं लगा दिया।

धोती और लाठी थी, जिसकी पहचान
वही बापू बना आज देश की पहचान

साबरमती के संत को कोटि कोटि प्रणाम।

“रतन टाटा का जीवन परिचय”

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