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मीटू मूवमेंट क्या है और इस मूवमेंट की शुरुआत भारत में कैसे हुई?

वर्तमान डिजिटल इंडिया में मीटू मूवमेंट बहुत चर्चित है। जहाँ देखो वहीं इस मूवमेंट की चर्चा हो रही हैं। 2006 में यह मूवमेंट हॉलीवुड से शुरू हुआ था। अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने इस आंदोलन की शुरुआत की थी।

भारत में यह आंदोलन 2017 से आया। जिसकी शुरुआत तनुश्री दत्ता के आरोपों से हुई। आइए अब यह जानें की यह मीटू मूवमेंट क्या है और इससे कौन-कौन जुड़े है।

मीटू मूवमेंट क्या है?

मीटू मूवमेंट महिलाओं से जुड़ी हर समस्या को सामने लाने से जुड़ा है। जैसे वर्कप्लेस पर महिलाओं को क्या-क्या सहना पड़ता है या नौकरी से जुड़ी कोई समस्या या तरक्की के लिए महिलाओं को किस तरह मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।

इस कैंपेन में महिलाएँ अपने साथ हो चुके या हो रहे उत्पीड़न को अपने मुख से सोशल मीडिया के माध्यम से सांझा कर रही है। साथ ही वे यह भी लिख रही है की समानता के अधिकार के बावजूद भी उन्हें ही सब कुछ क्यों सहना पड़ता है।

कुछ महिलाएँ मीटू मूवमेंट के जरिए स्क्रीन शॉट भी शेयर कर रही है की 21वी सदी में भी औरतें ही क्यों समझौता करे। कम शब्दों में यह कहना उचित होगा की यह महिलाएँ इस कैंपेन के जरिए यह कहना चाह रही है की आज भी औरतों को काम करने में कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए आज मीटू मूवमेंट की जरूरत पड़ी।

यह बहुत खुशी की बात है की महिलाएँ अपने हक की लड़ाई स्वयं लड़ रही है और अपनी आपबीती का दर्द रोजाना साझा कर रही है। इस कैंपेन के शुरू होने से महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न को समझने में सरकार को भी मदद मिलेगी। दिनों दिन इस कैंपेन में महिलाओं की तादात बढ़ती जा रही है।

सरकार और देश वासियों के लिए यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है की क्या हमारी बहन-बेटी सुरक्षित है? इस कैंपेन के शुरू होने के बाद से अब तक कई नामी-गिरामी हस्तियों के नाम सामने आ चुके है। जिसमें बॉलीवुड से जुड़े बड़े नाम के साथ नेताओं के नामों का भी खुलासा हुआ है।

हम किसी का नाम उजागर करके अपनी गरिमा का हनन नहीं करना चाहते। हमारा मानना है जब तक आरोपों का प्रमाण सत्यता के साथ उजागर ना हो तब तक कोई दोषी नहीं हो सकता। हम इसका समर्थन बिल्कुल नहीं कर रहे की यह आरोप झूठे है लेकिन मीटू मूवमेंट के सांचे में कितने फिट बैठते है इसका आंकलन बहुत जरूरी है।

क्योंकि इस तरह के गंभीर आरोपों से सिर्फ एक व्यक्ति की छवि खराब नहीं होती बल्कि उसके पूरे परिवार, समाज और देश की छवि भी बिगड़ती है। सत्यता की कसौटी पर अगर आरोपित व्यक्ति गलत है तो निश्चित ही वह सजा का हकदार है।

मीटू मूवमेंट के साथ कई फिल्मी सितारे भी जुड़े है जैसे आमिर खान, बॉबी देओल, अक्षय कुमार, आदित्य चोपड़ा, अजय देवगन, कंगना रनौत, दीपिका पादुकोण आदि कई बड़ी हस्तियों के साथ-साथ अब इंडस्ट्री के जाने-माने राइटर सलीम खान भी इस कैंपेन का खुलकर समर्थन कर रहे है।

वहीं कई लोग यह प्रश्न भी उठा रहे है की सालों पहले महिलाओं के साथ जो भी अत्याचार हुआ उसका अब क्या वजूद। ऐसे सवालों के जवाब में कई हस्तियों ने भागीदारी ली है। तो फिलहाल देश में मीटू मूवमेंट से जुड़ें सवाल पर बॉलीवुड के सितारे क्या कह रहे है इसपर एक नजर डाले।

सलीम खान – जो लोग इस मूवमेंट के खिलाफ है उनका कहना है की वर्षो बाद अब महिलाएँ अपनी दास्ता क्यों सुना रही है। मैं ऐसे लोगों को कहना चाहता हूँ ”देर आए लेकिन दुरुस्त आए”। औरतें रिजल्ट की उम्मीद से खुलासे नहीं कर रही। वो तो पब्लिक सपोर्ट चाहती है जो उन्हें मिल भी रहा है।

क्योंकि इंसान उँचाई से गिरकर तो उठ सकता है लेकिन अपनी और समाज की नजरों से गिरकर नहीं। इसलिए मैं यही कहूँगा ”देर से ही सही लेकिन बदलाव आना शुरू तो हुआ है।”

लता मंगेशकर – हर महिला की गरिमा का सम्मान सदैव होना चाहिए क्योंकि यह उनका मूल अधिकार भी हैं। महिला चाहे घरेलू हो या कामकाजी उन्हें स्पेस देना चाहिए। इस अधिकार में अगर कोई जबरदस्ती हस्तक्षेप करने का प्रयास करता है तो उसे सिख मिलनी जरूरी है।

दीपिका पादुकोण ने अपने फाउंडेशन से टॉप के टैलेंट मैनेजर की भी छुट्टी कर दी आरोपों के बाद।

अब प्रश्न यह उठता है की समाज में क्या जागरूकता की इतनी कमी हो गई जो औरतों को मीटू मूवमेंट का दामन थामना पड़ा। दरअसल जागरूकता का अभियान अपने घर से अपने बच्चों से शुरू करना चाहिए। आइए इस बारे में अमेरिकी महिला लिज़ क्लाइनरॉक के क्या विचार है उसे समझे।

लिज़ अमेरिका की एक स्कूल में टीचर है। हाल ही में इंस्टाग्राम पेज पर उन्होंने एक ‘कन्सेंट चार्ट’ की तस्वीर शेयर की। इस चार्ट के माध्यम से उन्होंने बच्चों को यह समझाया की कैसे निजता का ध्यान रखा जाए और कैसे एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए।

लिज़ का मानना है की बच्चों को बचपन से ही कन्सेंट यानी सहमति की जानकारी होनी चाहिए। जिससे बड़े होने के बाद वो किसी की गरिमा को ठेस ना पहुँचाए। इस तरह की परवरिश से बच्चों को शुरू से ही सहमति और असहमति के बीच का अंतर पता होगा। जब बच्चों को शुरू से ही हाँ या ना को स्वीकारने की आदत होगी तो वो बड़े होकर भी किसी पर दबाव नहीं बनाएँगे।

लिज़ ने बच्चों को उस चार्ट के माध्यम से यह भी समझाया की हाँ और ना दोनों की इज्ज़त करो। क्योंकि हाँ और ना एक ही सिक्के के दो पहलू है जो बात आपके लिए सही हो वही बात दूसरे की नजर में गलत है। इसलिए किसी पर किसी भी बात का दबाव नहीं होना चाहिए। अगर कोई दबाव में आके हाँ बोलता भी है तो उसके हाव-भाव को समझो और सामने वाले की मन की सुनो।

लिज़ कहती है मैंने समाज में बहुत कुछ गलत होते देखा है इसलिए बच्चों को कुछ बेसिक चीज़ें बचपन से ही सिखा दी जाए तो शायद आने वाले समय में किसी महिला को मीटू का सहारा ना लेना पड़े। बच्चे के साथ वर्कप्ले करे और जब भी कोई उनसे गले मिले या हाथ मिलाए फिर चाहे परिजन ही क्यों ना हो बच्चों से खुलकर पूछे क्या आप बॉडी लैंग्विज पढ़ पा रहे हो या आपको कैसा महसूस हुआ?

इस तरह से बच्चों के साथ उम्र के हिसाब से प्ले करते रहे। इससे आपका बच्चा हमेशा आपसे अपनी सारी समस्या साझा करेगा और बड़ा होकर कुछ गलत भी नहीं करेगा। दरअसल आजकल लोग कन्सेंट से सेक्शूअल कन्सेंट ही समझते हैं। मगर कन्सेंट हर चीज़ के लिए जरूरी है। फिर चाहे किसी को गले लगाना हो या किसी से गिफ्ट मांगना हों।

मीटू कैंपेन की समस्या की गंभीरता को अब समझने की जरूरत है। अब इस अभियान को एक्शन मोड में लाने की जरूरत है। इसलिए बचपन से ही बच्चों में एक दूसरे की इज़्जत करने की भावना को जन्म दीजिए। समाज में सुधार लाने हेतु यह सबसे अच्छी पहल है। इससे आने वाले समय में लोग मीटू की बजाय ”केन आइ हेल्प” कैंपेन को शुरू करेंगे और जुड़ेंगे।

अपनी ओर से लिज़ तो कोशिश कर रहीं हैं। लेकिन बच्चों को कन्सेंट और बाउंड्रीज़ के बारे में शुरू से समझाना हर टीचर और मां-बाप की अनिवार्यता है। अगर बच्चों में बचपन से यह कॉन्सेप्ट्स क्लियर कर दिया जाएं तो शायद एक दिन #मीटू जैसे मूवमेंट्स की आवश्यकता ही ना हो।

उम्मीद है जागरूक पर मीटू मूवमेंट क्या है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और आपके लिए फायदेमंद भी साबित होगी।

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