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पंचतंत्र की कहानियां किसने और क्यों लिखी?

पंचतंत्र की कहानियां तो शायद आपने भी अपने बचपन में सुनी होगी और इन कहानियों को आपने बहुत पसंद भी किया होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि पंचतंत्र की ये कहानियां आप के दौर में नहीं लिखी गयी थी बल्कि इनका इतिहास तो बहुत पुराना है। ऐसे में क्यों ना आज, पंचतंत्र की कहानियों के इतिहास को जानें और इनके रचयिता से जुड़ी जानकारी भी लें।

तो चलिए, आज जानते हैं पंचतंत्र की कहानियों से जुड़ी कुछ ख़ास बातें:-

पंचतंत्र एक विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ है। नीति-कथाओं में पंचतंत्र का पहला स्थान है। अब तक लगभग 50 भाषाओँ में पंचतंत्र का अनुवाद हो चुका है और इसके लगभग 200 संस्करण भी हैं।

इस कथा ग्रन्थ में राजनीति के पांच तंत्र यानी भाग हैं इसलिए इसे पंचतंत्र कहा गया। संस्कृत भाषा में इसे पांच निबंध या अध्याय भी कहा जाता है। पंचतंत्र के रचयिता पंडित विष्णु शर्मा हैं जिन्होंने एक राजा के तीन मंदबुद्धि बेटों को पशु कथाओं के माध्यम से शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की।

ये कथा पुस्तक कितनी विशेष और महत्वपूर्ण है, ये इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि इस किताब का अनुवाद दुनिया की लगभग हर भाषा में हो चुका है। इस ग्रन्थ का हिंदी में प्रकाशन कई विदेशी भाषाओँ में प्रकाशन के बाद हुआ।

इस पुस्तक की विशेषता है कि इसमें जीवन का गहन ज्ञान देने के लिए जानवरों को पात्र बनाया गया और उनके माध्यम से शिक्षाप्रद बातें लिखी गयी। इस तरह रोचक रुप में मिले व्यावहारिक ज्ञान को समझना तो बालक के लिए भी बहुत सरल हो जाता है, शायद इसलिए इस पुस्तक को बालक से लेकर वयस्कों ने बहुत पसंद किया और न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में इसे बहुत सराहना मिली।

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पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों के अलावा मानव पात्र भी हैं। इन कहानियों की प्रसिद्धि का कारण इनकी जीवंतता है। साथ ही ये कथाएं मनोविज्ञान, व्यावहारिकता, नेतृत्व का गुण और राजकाज के सिद्धांतों का सहज ज्ञान भी देती है।

इन कहानियों को करटक और दमनक पात्रों के जरिये सुनाया गया हैं। ये दोनों पात्र इस कथा में मौजूद पिंगलक नामक सिंह के सियार मंत्री के दो बेटे थे। पंचतंत्र को पांच भागों में बांटा गया है:-

  1. मित्रभेद:- इस मुख्य कथा में बहुत-सी शिक्षाएं दी गयी हैं जैसे धैर्य से व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति का भी सामना कर सकता है इसलिए मुश्किल हालातों में भी धैर्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
  2. मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति:- इस भाग में मित्र प्राप्ति के सुख और आंनद को बताया गया है और कपोतराज चित्रग्रीव की कथा के माध्यम से ये उपदेश दिया गया है कि व्यक्ति को उपयोगी मित्र ही बनाने चाहिए।
  3. काकोलुकीयम्:- इस भाग में उल्लू और कौवे के माध्यम से बताया गया है कि शत्रुओं से हमेशा सावधान रहना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति शत्रु और रोग की उपेक्षा करता है, वह उसी से मारा जाता है।
  4. लब्धप्रणाश:- इस भाग में वानर और मगरमच्छ की कथा के माध्यम से ये शिक्षा दी गयी है कि बुद्धिमान अपनी बुद्धि के बल से जीत जाता है और मूर्ख हाथ आयी वस्तु को भी गँवा देता है।
  5. अपरीक्षितकारक:- इस भाग में बिना सोचे-समझे कार्य करने वाले एक नाई की कथा है जिसे अंत में मृत्युदंड मिलता है। इसमें ये सीख दी गयी है कि बिना सोचे – समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए वरना बाद में पछताना पड़ता है।
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पंचतंत्र की रचना कब हुयी, इस सम्बन्ध में कोई स्पष्ट जानकारी अब उपलब्ध नहीं है क्योंकि इस ग्रन्थ की भाषा शैली और इसके रचयिता के आधार पर पंचतंत्र के रचनाकाल को लेकर बहुत से मत हैं। इस कथा ग्रन्थ के बहुत से अनुवादों के आधार पर ये माना गया कि इसकी रचना तीसरी शताब्दी के आसपास हुयी होगी जबकि एक मत के अनुसार पंचतंत्र की रचना चाणक्य ने की है क्योंकि विष्णुशर्मा चाणक्य का ही दूसरा नाम था। इस आधार पर पंचतंत्र को गुप्तकालीन रचना माना जाता है।

पंचतंत्र के चार संस्करण उपलब्ध हैं:-

प्रथम संस्करण मूलग्रंथ का पहलवी अनुवाद है जो अब अरबी और सीरियन अनुवादों के रुप में उपलब्ध है।

द्वितीय संस्करण बृहत्कथा में दिखाई देता है जो पैशाची भाषा में रची गयी है।

तृतीय संस्करण तंत्राख्यायिका और उससे सम्बद्ध जैन कथाओं का संग्रह है। आधुनिक काल का प्रचलित पंचतंत्र यही है।

चतुर्थ संस्करण दक्षिणी पंचतंत्र का मूलरुप है जिसका प्रतिनिधित्व नेपाली पंचतंत्र और हितोपदेश करते हैं।

दोस्तों, अब आप जान गए हैं कि पंचतंत्र की कहानियों की प्रसिद्धि का कारण इनका सरल और रोचक रुप में जीवन का गहन व्यावहारिक ज्ञान देना रहा है। जागरूक टीम को उम्मीद है कि ये जानकारी आपको रोचक लगी होगी और पंचतंत्र की कहानियों को फिर से पढ़ने और उनमें निहित ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी कर पायेगी।

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