संस्कृत की महान रचनाएँ

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आइये जागरूक पर जानते हैं संस्कृत की महान रचनाएँ कौन सी है। संस्कृत भाषा का साहित्य अनेक अमूल्य ग्रंथों से सराबोर है। इस भाषा की सम्पन्नता और इस भाषा का साहित्य सबसे ज्यादा समृद्ध है। ऋग्वेद से वर्तमान काल तक इस भाषा में रचित साहित्य ने अपना महत्त्व बरकरार रखा है। संस्कृत भाषा में धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक जैसे सभी प्रकार के साहित्य की रचनाएँ हुयी हैं। ऐसे में क्यों ना आज, संस्कृत की कुछ महान रचनाओं के बारे में जानकारी ली जाये।

तो चलिए, आज जानते हैं संस्कृत की कुछ प्रमुख रचनाओं के बारे में–

ऋग्वेदसंहिता:-

संस्कृत भाषा का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेदसंहिता है। ये ग्रन्थ आर्य जाति की सम्पूर्ण ग्रन्थराशि में भी प्राचीनतम ग्रन्थ है। आर्यजाति की आद्यतम निवास भूमि, उनकी सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़ा प्रमाणिक स्रोत यही ग्रन्थ है।

नाट्यशास्त्रम:-

इसके रचयिता भारत मुनि थे। संगीत, नाटक और अभिनय के सम्पूर्ण ग्रंथ के रूप में भारत मुनि के नाट्यशास्त्र का बहुत महत्त्व है। इसमें 37 अध्यायों में भरतमुनि ने रंगमंच, अभिनेता, अभिनय, नृत्यगीतवाद्य, दर्शक से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का विवरण दिया है।

काव्यादर्श:-

दंडी द्वारा रचित संस्कृत काव्यशास्त्र सम्बन्धी प्रसिद्ध ग्रन्थ काव्यादर्श है। इस ग्रन्थ के तीन परिच्छेद हैं। प्रथम परिच्छेद में काव्य के तीन भेद किये गए हैं – गद्य, पद्य और मिश्र। द्वितीय परिच्छेद में अलंकार के लक्षण, भेद और उदाहरण दिए गए हैं और तृतीय परिच्छेद में यमक का विवेचन है। इस ग्रन्थ के अंत में काव्यदोषों का परिचय भी दिया गया है।

ध्वन्यालोक:-

आचार्य आनंदवर्धन द्वारा रचित काव्यशास्त्र का ग्रन्थ ध्वन्यालोक है। आचार्य आनंदवर्धन काव्यशास्त्र में ध्वनि संप्रदाय के प्रवर्तक के रुप में प्रसिद्ध हैं। भारतीय साहित्यशास्त्र के इतिहास में ये ग्रन्थ एक युगांतकारी है। इस ग्रन्थ में ध्वनि सिद्धांत की उद्भावना और प्रतिष्ठा करके आनंदवर्धन ने साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में अमर स्थान प्राप्त किया है।

काव्यमीमांसा:-

काव्यमीमांसा काव्यशास्त्र सम्बन्धी मानक ग्रन्थ है जिसकी रचना कविराज राजशेखर ने की। इस ग्रन्थ में 19 अधिकरण शामिल किये गए थे और हर अधिकरण में कई अध्याय थे। काव्यमीमांसा का अभी तक केवल प्रथम अधिकरण कविरहस्य ही प्राप्त है।

अभिनवभारती:-

अभिनवगुप्त द्वारा दशम शती में रचित अभिनवभारती भरतमुनि के नाट्यशास्त्र की टीका है। इसमें अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के रससूत्र की व्याख्या की है।

दशरूपकम्:-

इस ग्रन्थ के रचयिता धनंजय है जिन्होंने दसवीं शती में ये रचना निर्मित की। इस ग्रन्थ में कुल चार अध्याय है जिन्हें आलोक कहा गया है। ये ग्रन्थ दशरूपकम् नाट्य के दशरूपों के लक्षण और उनकी विशेषताओं का प्रतिपादन करता है।

सरस्वतीकंठाभरण:-

ये काव्यतत्व का विवेचन करने वाला संस्कृत साहित्य शास्त्र का एक प्रमुख ग्रन्थ है। इसकी रचना धारेश्वर महाराज भोजराज ने एकादश शती में की थी। इस ग्रन्थ में पांच परिच्छेद है। इस ग्रन्थ की विशेषता ये है कि इसमें अनेक सूक्ष्म भेद और उपभेदों को समझाने का उदार प्रयास महाराज भोजराज ने किया है।

काव्यप्रकाश:-

काव्यप्रकाश ग्रन्थ आचार्य मम्मट / मम्मटाचार्य द्वारा रचित है। काव्य की परख कैसे की जाये, इस विषय पर उदाहरण सहित लिखा गया एक महत्वपूर्ण, विस्तृत और प्रमाणिक ग्रन्थ काव्यप्रकाश है। इस ग्रन्थ को आज भी विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

साहित्यदर्पण:-

पंडित विश्वनाथ द्वारा संस्कृत भाषा में रचित साहित्य विषयक ग्रन्थ साहित्यदर्पण है। ये ग्रन्थ भी मम्मट के काव्यप्रकाश के समान साहित्य आलोचना का एक प्रमुख ग्रन्थ है। 10 परिच्छेदों में विभक्त इस ग्रन्थ में काव्य के श्रव्य और दृश्य दोनों प्रभेदों के सम्बन्ध में विचारों की विस्तृत अभिव्यक्ति हुयी है।

दोस्तों, संस्कृत साहित्य बहुत समृद्ध है। इसमें अनेक महान रचनाएँ निहित हैं जिनमें से कुछ रचनाओं की जानकारी आपको आज मिल गयी है।

जागरुक टीम को उम्मीद है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और संस्कृत साहित्य की समृद्धता को अनुभव करने में सहयोगी भी साबित होगी और आप भी संस्कृत साहित्य से जुड़ाव और इसके प्रति रुझान अनुभव कर सकेंगे।

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