सूर्य ग्रहण क्या है?

आइये जानते हैं सूर्यग्रहण क्या होता है। साल का आखिरी सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर यानि गुरुवार के दिन लगने जा रहा हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले ही ग्रहण का सूतक लग जाएगा और यह सूर्य ग्रहण ऐसा ग्रहण होगा जो करीब 58 साल बाद लगने जा रहा है। इस सूर्य ग्रहण के दौरान 6 ग्रह सूर्य, गुरु, चंद्रमा, शनि, बुध की युति धनु राशि में केतु के साथ होगी। इससे पहले ऐसा सूर्य ग्रहण 5 फरवरी 1962 में लगा था।

ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि ग्रहण का प्रभाव सभी राशियों पर होता है उस पर से जब 6 ग्रह एक साथ ग्रहण के समय साथ होंगें तो इसका व्यापक असर होगा। कहते है की इस सूर्य ग्रहण का प्रभाव कुछ अच्छा होता है और कुछ बुरा भी। तो आइए जानते हैं जागरूक पर सूर्य ग्रहण के बारे में।

सूर्य ग्रहण क्या है

सूर्य ग्रहण क्या होता है?

यह तो आप सब जानते ही होंगे की पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने के साथ-साथ अपने सौरमंडल के सूर्य के चारों ओर भी चक्कर लगाती है और चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है और यह पृथ्वी के चक्कर लगता है।

इसलिए, जब भी चंद्रमा चक्कर काटते-काटते सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, तब पृथ्वी पर सूर्य आंशिक या पूर्ण रूप से दिखना बंद हो जाता है। इसी घटना को सूर्यग्रहण कहा जाता है।

इस खगोलीय स्थिति में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी तीनों ही एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। सूर्यग्रहण अमावस्या के दिन होता है, जबकि चंद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा के दिन होता है।

पूर्ण ग्रहण कब होता है?

ज्यादातर चाँद, सूरज के सिर्फ़ कुछ हिस्से को ही ढ़कता है और यह स्थिति खण्ड-ग्रहण कहलाती है। कभी-कभार ही ऐसा होता है कि चाँद सूरज को पूरी तरह ढँक लेता है। जिसे हम पूर्ण-ग्रहण कहते हैं। इस पूर्ण-ग्रहण को हम धरती के बहुत कम क्षेत्र में ही देख सकते है और बाकि क्षेत्र में केवल खंड-ग्रहण दिखाई देता है।

पूर्ण-ग्रहण के समय चाँद को सूरज के सामने से गुजरने में दो घण्टे लगते हैं। चाँद सूरज को पूरी तरह से, ज़्यादा से ज़्यादा, सात मिनट तक ढँक सकता है। इस समय आसमान में अंधेरा हो जाता है या यह कहा सकते है कि दिन में रात हो जाती है।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण

ज्योतिष के दृष्टिकोण के अनुसार यदि बात करे तो सूर्य ग्रहण अभूतपूर्व, अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान, ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियों एवं उनके स्वरूप को स्पष्ट ज्ञान कराता है। सूर्य ग्रहण तब होता है, जब सूर्य आंशिक अथवा पूर्ण रूप से चन्द्रमा द्वारा आवृ्त हो जाए।

इस प्रकार के ग्रहण के लिए चन्दमा का पृथ्वी और सूर्य के बीच आना आवश्यक है। इससे पृ्थ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का आवृ्त भाग नहीं दिखाई देता है।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार सूर्य ग्रहण निम्न शर्ते पूरी होनी आवश्यक है-

• अमावस्या होनी चाहिये।
• चन्दमा का रेखांश राहू या केतु के पास होना आवश्यक है।
• चन्द्रमा का अक्षांश शून्य के निकट होना आवश्यक है।

सूर्यग्रहण के प्रकार

चन्द्रमा द्वारा सूर्य के पूरे या कम भाग के ढ़के जाने की वजह से सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं जो की निम्नलिखित है-

1. पूर्ण सूर्य ग्रहण– पूर्ण-ग्रहण के समय चाँद को सूरज के सामने से गुजरने में दो घण्टे लगते हैं। चाँद सूरज को पूरी तरह से, ज़्यादा से ज़्यादा, सात मिनट तक ढँक सकता है।

2. आंशिक सूर्य ग्रहण– जब चन्दमा, सूर्य के केवल कुछ भाग को ही अपनी छाया में ले पाता है इससे सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है तो पृथ्वी के उस भाग विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है।

3. वलयाकार सूर्य ग्रहण– इस सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी दूर रहते हुए भी पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है और सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता है।

सूर्य ग्रहण से जुड़ी कुछ सामजिक भ्रांतियां

सूर्य ग्रहण को लेकर समाज में कई सारी भ्रांतियां मौजूद है जो की निम्न लिखित है-

  • कई लोगों का कहना है की सूर्य ग्रहण के दौरान राहु सूर्य को ग्रास लेता है।
  • लोगों का मानना है की सूर्य ग्रहण के समय पका हुए भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • कई लोगों का तो यह भी मानना है की सूर्य ग्रहण के समय किसी भी प्रकार का शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
  • कहते है की सूर्य ग्रहण के समय राशियों पर भी बहुत प्रभाव पड़ता है।

आशा करते है की आप जागरूक पर सूर्य ग्रहण क्या है से जुडी इस जानकारी को समझ पाएं होंगे। हमें उम्मीद है आपको जागरूक पर हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी।

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References:

सूर्य ग्रहण – विकिपीडिया