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स्वामी विवेकानंद का प्रेरणात्मक जीवन

पूरे विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसे “भारत माता” के नाम से संबोधित किया जाता है क्योंकि इस धरा ने समय-समय पर अपनी और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए वीरो को जन्म दिया है उन्ही वीरो में से एक नाम है महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी, इनके नाम में ही भारतीय संस्कृति का समावेश है। महान विचारक स्वामी विवेकानंद जी के जन्म से यह धरती भी गौरवानवित हुई क्योंकि स्वामी जी का जन्म उस समय हुआ जब यह धरती मा जंजीरो में जकड़ी हुई थी। हमारी विरासत, संस्कृति, धर्म, शिक्षा, भाषा सब कुछ इस धरा से लुप्त हो रहा था। हम इस लेख में इन महान विचारक स्वामी विवेकानंद का प्रेरणात्मक जीवन पर कुछ रोशनी डालने की कोशिश करेंगे।

महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 की सुबह सूर्योदय से ठीक छ: मिनट पहले हुआ था। इन महापुरुष का स्वागत खुद प्रकरती ने मंगल बेला मे मंगल शंख और मंगल ध्वनि से किया। आपका जन्म कलकत्ता की पावन भूमि में हुआ। आपके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। बाल्यकाल में आपको नरेन्द्र दत्त के नाम से और बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से नवाजा गया। नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद तक का सफ़र बहुत ही प्रेरणादायक था।

पाँच वर्ष की उम्र में ही नरेन्द्र को शिक्षा के लिए पाठशाला भेज दिया गया। 1879 मे मेट्रिक की परीक्षा उतीर्ण कर कलकत्ता के जनरल असेंब्ली कॉलेज से बि.ए. की परीक्षा भी उतीर्ण की। आप पर आपके पिता के पाश्चात्य सभ्यता और अँग्रेज़ी शिक्षा के विचारो का तो असर नही हुआ लेकिन आपकी माताजी के धार्मिक आचार – विचारो का अविश्वशनीय प्रभाव पड़ा जिस कारण आपका बचपन से ही धार्मिक प्रवर्ती में रुझान रहा।

स्वामी जी के अंदर बचपन से ही परमात्मा को जानने और देखने की प्रबल इच्छा थी। इसी जिग्यासावश इन्होने अपनी तलाश जारी रखी। इसि क्रम में उन्होने सन् 1881 में प्रथम बार रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की और अपनी जिग्यासा को शांत करने हेतु रामकृष्ण परमहंस के आश्रम में शरण ली। कुछ ही दीनो में स्वामी परमहंस ने स्वामी जी की योग्यता को जान लिया और उनके गुणों को परखने के बाद परमहंस जी ने कहा की नियती ने कुछ ख़ास कार्य हेतु तुम्हे भेजा है, तुम्हे समस्त मानव जाती का कल्याण करना है। तुम सिर्फ़ अपने देश तक ही सीमित नही रहोगे बल्कि विदेशो में भी भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना है, जिससे हमारे देश के हताश हुए नौजवानो को तुमसे अपने देश व धर्म के प्रति प्रेरणा मिलेगी। स्वामी परमहंस की यह बाते सुन कर स्वामी जी ने अपना सारा जीवन भक्ति, धर्म और अपने देश को अर्पित करना ही अपना कर्तव्य समझा और वे परमहंस जी के के प्रिय शिष्य और अनुयायी बने। जिस कारण स्वामी जी ने सन्यास लेने का निर्णय किया।

परमहंस जी ने स्वामी जी के सन्यास का विरोध करते हुए कहा अगर तू अपनी मुक्ति की इच्छा से सन्यास ले रहा है तो मत ले क्युकि दुनिया में लाखो लोग दुखी है उनका दुख दूर करने कौन आएगा। फिर नरेन्द्र दत्त ने परमहंस जी से शिक्षा ग्रहण की. वेद – वेदांत, ग्रंथों में महारत हासिल की और कहा सन्यास का वास्तविक अर्थ “मुक्त होकर जन सेवा” करना ही असली सन्यास है। सिर्फ़ अपने मोक्ष की कामना करते हुए जो सन्यास लेता है वो स्वार्थी सन्यासी है। नरेंद्र ने सन्यास का अपना विचार त्याग कर नौकरी करनी चाही लेकिन उन्हे हताशा ही हाथ आई तो वे मानव कल्याण के लिए सन्यास को ही अपना मार्ग चुना जिसके बाद से वे नरेन्द्र से विवेकानंद कहलाए। विवेकानंद जी काली मा के परम भक्त थे। सन् 1886 में परमहंस जी की मृत्यु के उपरांत स्वामी जी कलकत्ता छोड़ उत्तर में वराद नगर के आश्रम में रहकर दर्शन और अन्य शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया और दो वर्ष की कठोर तपस्या के बाद स्वामी जी भारत यात्रा पर निकल पड़े।

25 वर्ष की आयु में स्वामी जी गेरवा वस्त्र धारण किए और देश विदेश की यात्रा पर निकल पड़े। स्वामी ने सारे जगत को आत्म रूप बताया और कहा “आत्मा को हम देख नही सकते किंतु अनुभव कर सकते है।” सारे जगत का निर्माण आत्मा से होता है और उसी में ही विलीन हो जाता है।

उन्होने अपने उपदेशो मे कहा मनुष्य धर्म के लिए नही है, बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है। भारत मे विशेषकर युवाओ के लिए उनका यह नारा बहुत ही प्रसिद्ध हुआ – “उठो जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक रूको मत”।

अपने संबोधन से उन्होने सम्मेलन मे एक अलग पहचान कायम की। इन्होने यूरोपीय देशो के अलावा अमेरिका और इंग्लेंड में अपना ज़्यादातर समय दिया। वहाँ रहकर इन्होने भाषण, वाद-विवादो, लेखो द्वारा हिन्दुत्व को फिर से जीवंत किया और कहा हिंदू धर्म भी श्रेष्ठ है, इसमें सभी धर्मो को समाहित करने की क्षमता है।

11 सितंबर 1883 के शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में ऐसा ओजस्वी भाषण दिया की सभी मंत्र-मुग्ध होकर तालिया बजाते हुए सुनते रहे। स्वामी जी को 20 मिनिट की समय अवधि दी गयी, लकिन स्वामी जी दिए गये समय से भी ज़्यादा भाषण दिया। निर्धारित समय कब पूरा हो गया यह किसी को पता ही नही चला। इस भाषण के बाद हज़ारो लोग उनके शिष्य बने। शिकागो में उनके लिए भाषण देना उनके लिए कतई आसान नही था। कई चुनोतिया और मुसीबते भी आई लेकिन उगते सूरज को कौन रोक सकता है।

इस तरह सभी विपरीत परिस्थितियो का सामना करते हुए स्वामी जी ने सात समंदर पार विदेशो में भी भारतीय संस्कृति का झंडा लहरा दिया। यह कहना कतई ग़लत नही होगा की भारतीय संस्कृति को विश्व में पहचान दिलाने का श्रेय स्वामी विवेकानंद जी को ही जाता है। चार वर्षो तक स्वामी जी ने विदेशो में घूम-घूम कर हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया और भारत को विश्व के नक्शे में एक अलग पहचान दिलाई। जिसके बाद भारत को एक ग़रीब देश के रूप में नही बल्कि सुसंस्कृत देश के रूप मे स्थान मिला। 1887 में स्वामी जी भारत लौट आए। वे अपने भाषण से पराधीन भारतीय समाज को स्वार्थ, भय और कायरता की नींद से झंझोर कर जगाया और कहा “मैं हज़ार बार नरक मे जाने को तैयार हूँ यदि मैं अपने सोए हुए देशवासीयो का जीवन-स्तर तोड़ा सा भी उठा सकु”।

अपनी ओज पूर्ण वाणी के ज़रिए वे हमेशा ही भारतीय युवाओ को उत्साहित करते रहे। स्वामी जी एक महान देशभक्त भी थे। स्वामी जी ने अशिक्षा, अज्ञान, भूख, बीमार और ग़रीबी से लड़ने के लिए राष्ट्र में चेतना भरी और कहा मानवता सर्वोपरि है. 1899 में कलकत्ता में भीषण प्लेग फेला,अस्वस्थ होते हुए भी स्वामी जी ने तन, मन और धन से बीमार लोगो की सेवा कर इंसानियत की मिसाल कायम की।

1 मई, 1897 में स्वामी विवेकानंद जी ने राम-कृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना की, इस मिशन का एकमात्र लक्ष्य मानव सेवा, परोपकार है। स्वामी जी के ये शब्द आज भी याद आते है :- “हमे किसी भी परिस्तिथि में अपने लक्ष्य से भटकना नही चाहिए.”

इस तरह स्वामी जी संपूर्ण विश्व के “जननायक” बन गये। बीमारी के कारण 39 वर्ष की छोटी सी आयु मे सन् 18 जुलाई 1902 की रात वे हमेशा के लिए भारत माता की गोद मे चिर-निद्रा में सो गये। छोटी सी उम्र में ही उन्होने अपने जीवन को इतना प्रेरणादायक बनाया की वे आज हमारे बीच न होते हुए भी सदा के लिए अमर हो गये।

जब-जब भी मानवता हताश-निराश होगी, तब-तब स्वामी जी के विचार, ओजस्वी भाषण और उपदेश जन-जन मे उर्जा प्रदान करेगी और प्रेरणा देते रहेंगे। स्वामी जी के विचार आने वाली पीढ़ियो को सदा मार्ग दर्शन देते रहेंगे। स्वामी जी का जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनकी शिक्षा में सबसे महान शिक्षा है – “मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है”।

जब-जब भारत मा को अपनी रक्षा की ज़रूरत महसूस होती है तब-तब ये धरा युग अवतारी पुरुष को जन्म देती है और फिर ये युग अवतारी पुरुष समाज को अपनी वाणी सुनने के लिए बाध्य करते है, जिससे इस समाज कीं आत्मा फिर से जागृत होकर अपने देश, अपने धर्म की रक्षा करती है. विश्व का इतिहास इसका साक्षी है।

इनके जीवन से हमे शिक्षा लेनी चाहिए। इनके आदर्शो को हम अपने जीवन में भी धारण करें, तभी सच्चे अर्थो में इस महापुरुष को हमारी तरफ से सच्ची श्रधांजलि होगी।

“जरूर पढ़ें ये 7 प्रेरणात्मक किताबें, जीवन को मिलेगी नई राह”

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