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तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित

आइये जानते हैं तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित। महाकाव्य रामचरित्रमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी किसी परिचय के मोहताज नहीं। जीवन के कठिन क्षणों का कैसे सामना करे, ऐसी कई समस्याओं का हल अपनी रचनाओं में बड़ी ही सहज और सरलता से समझाया हैं।

इनका जन्म सन् 1500 में उत्तर प्रदेश के राजापुर गाँव में हुआ। यह अपनी पत्नी रत्नावली से बेहद प्रेम करते थे और एक बार घनघोर अंधेरी और तूफानी रात में यह अपनी पत्नी से मिलने हेतु अपने ससुराल पहुँच गये।

यह देखकर इनकी पत्नी ने कहा ”जितना प्रेम तुम मेरे इस नश्वर शरीर से करते हो, उसका क्षणिक मात्र भी अगर तुम राम नाम में लगाते तो आज इस भवसागर को पार कर लेते।” इस उलाहना से तुलसीदास जी का मन बहुत व्याकुल हुआ और वे वैराग्य की ओर उन्मुख हो गये।

तब से तुलसीदास जी पूरे तन-मन से राम की भक्ति में लीन हो गये और कई महान ग्रंथों की रचना की, जिनमें रामचरित्रमानस और हनुमान चालीसा अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। इनकी रचनाएँ आज भी समाज का मार्गदर्शन करती हैं।

यह हिन्दी साहित्य के महान कवि थे। जिनकी रचनाएँ आज भी जनमानस का मन लुभाती हैं और इनके लिखित दोहे तो ज्ञान-सागर के समान है। क्योंकि इनके दोहों में अनमोल संदेश छुपे है।

अगर हम इनके दोहों को अर्थ सहित पढ़े और समझे तो यह दोहे हमारे जीवन में प्रेरणास्त्रोत के रूप में कार्य करेंगे। तो आइए तुलसीदास जी के दोहों को सरल अर्थ के साथ पढ़े और अपने जीवन में उतारे।

तुलसीदास जी के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित

1 दोहा – बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय।
आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कहना चाह रहे है की तेजहीन व्यक्ति की बातों या सलाह का कोई मोल नहीं। क्योंकि जब तेजहीन व्यक्ति का ही जब कोई महत्व नहीं तो फिर भला उसकी आज्ञा का पालन कौन करेगा? ठीक वैसे ही जब राख में लगी आग ठंडी हो जाती है तो हर कोई उसे छूने चला जाता हैं।

2 दोहा – तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कहना चाह रहे है की अपार मुश्किल की घड़ी में मनुष्य का साथ यह सात गुण ही देते है ज्ञान, नम्र व्यवहार, साहस, विवेक, सुकर्म, सत्यता और ईश्वर का नाम।

3 दोहा – राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कहते है की हे मानव अगर तुम अपने अंदर और बाहर दोनों तरफ उजाला ही उजाला चाहते हो तो अपने मुख के द्वार में जो जीभरूपी दहलीज है उस पर सदैव राम नामरूपी मणिदीप को रखो। कहने का भाव यह है सोते-जागते, उठते-बैठते प्रत्येक कार्य को करते हुए अपने मुख से प्रभु का नाम लेते रहो।

4 दोहा – तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है की सुंदर वेष-भूषा को देखकर केवल मूर्ख ही आकर्षित नहीं होते अपितु चतुर व्यक्ति भी छलावे में आ जाता है। जैसे सुंदर मोर को ही देख लो, उसका स्वर मानो कानों में अमृत घोलता है लेकिन आहार साँप का हैं।

5 दोहा – तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कहना चाह रहे है की मीठी बोली स्वयं के साथ अपने चारों ओर सुख को प्रकाशित करती हैं। यह एक ऐसा अचूक मंत्र है जो सबको अपनी ओर सम्मोहित करता हैं। इसलिए हर व्यक्ति को कटु वचन का त्याग कर मीठे बोल बोलने का प्रयास करना चाहिए।

6 दोहा – काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कहना चाह रहे है की जब तक मनुष्य के मन में काम वासना, क्रोध, घमंड, लालच जैसी भावना से ग्रस्त मनुष्य चाहे ज्ञानी हो या मूर्ख दोनों एक समान होते है। इनमें कोई अंतर नहीं होता।

7 दोहा – नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जिस तरह कल्पतरू मन चाहा फल देता है और कल्याण का वास यानी मुक्तिधाम होता हैं। ठीक उसी प्रकार राम का नाम कल्पतरू के समान है जिनके नाम मात्र से हमें मुक्ति मिल जाती है और निरंतर राम की साधना करने से मैं तुलसीदास भी तुलसी की तरह पवित्र हो गया।

8 दोहा – दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है दया भावना से धर्म की उत्पत्ति होती है और घमंड से पाप कर्म का जन्म होता हैं। इसलिए जब तक शरीर में प्राण है तब तक मनुष्य को दया धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

9 दोहा – बचन वेष क्या जानिए मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना दस मुख प्रमुख विचारि।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है की किसी भी मनुष्य की पहचान इस आधार पर नहीं की जा सकती की उसकी बोली मीठी और पोशाक सुंदर है। बाहरी आडंबर से आकर्षित होकर यह कहना मुश्किल है की वह व्यक्ति मन से सज्जन है या दिमाग से दुष्ट। क्योंकि शूर्पणखा, मरीचि, राक्षसी पूतना और दस मुखी रावण के परिधान और वाणी दोनों ही बाहर से सुंदर थे लेकिन मन अंदर से गंदा था। यह उदाहरण विचारणीय हैं।

10 दोहा – सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जो व्यक्ति अपने हित-अहित का सोचकर शरण में आए अतिथि का त्याग करता है वो व्यक्ति क्षुद्र और पापमय के समान होते हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा उचित होगा की ऐसे व्यक्ति के दर्शन मात्र से ही स्वयं को हानि पहुँचती हैं।

11 दोहा – सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है की मंत्री, चिकित्सक और गुरु जब डर या लोभ के कारण दूसरों के हित की नहीं बल्कि अपने हित के कारण प्रिय बोल बोलते है तो देश, शरीर और धर्म तीनों का पतन शीघ्र ही सुनिश्चित हो जाता हैं।

12 दोहा – आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जिस जगह या घर में आप के जाने से वहाँ के लोग खुश ना हो और ना ही उनकी आँखों में आपके लिए प्यार दिखता हो, तो ऐसी जगह पर अपमानित होने के लिए कभी नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वहाँ पर सोने की ही बरसात क्यों ना हो। कहने का तात्पर्य यह है जहाँ सम्मान के भाव की जगह धन का दिखावा कर के आपका अपमान हो रहा है ऐसी जगह भूल कर भी कदम नहीं रखना चाहिए।

13 दोहा – सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जो गुरू और स्वामी अपनी अंतरात्मा से हित चाहते है और ऐसे में जो उनकी सलाह को सिर चढ़ाकर नहीं मानता वो अपने मन में बहुत पछताता हैं। इतना ही नहीं जीवन में उसके हित की हानि भी निश्चित है।

14 दोहा – तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोई।
तिनके मुंह मसि लागहैं मिटिहि न मरिहै धोई।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है जो व्यक्ति अन्य की निंदा कर के स्वयं की पीठ थपथपाने का काम करते है सही मायने में वे मतिहिन होते है। इस कुकर्म के कारण एक दिन उनके मुख पर भी ऐसी बदनामी की कालिख लगेगी है जो मरने के बाद भी नही धुलेगी।

15 दोहा – मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है मुखिया को मुँह की तरह होना चाहिए जो खाता-पीता तो अकेला है, लेकिन अपने विवेक से पूरे शरीर के अंगों का पालन-पोषण अच्छे से करता हैं। कहने का भाव यह है मुखिया के निर्णय से हित सभी का हो।

16 दोहा – सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है शूरवीर तो युद्ध में अपनी शूरवीरता सिद्ध करते है। वीर अपने मुख से स्वयं की तारीफ करके कुछ जताना नहीं चाहते। जबकि कायर युद्ध में दुश्मन को अपने सामने देखकर अपने प्रताप का ढोल पीटे बिना नहीं रह सकते। क्योंकि वीरता उसमें नहीं जो स्वयं की तारीफ करे बल्कि वीरता तो वो है जब शत्रु भी उसके शौर्य की तारीफ करने पर बाध्य हो जाए।

17 दोहा – तनु गुण धन धरम तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना परिनामहू गत जान।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है रूप, अच्छे गुण, धन, शौर्य और धर्म के अभाव में भी जिन लोगों को अहंकार होता है उनका जीवन कष्टदाई तो होता ही है। साथ ही उनके जीवन का अंत भी दुखदाई होता है।

18 दोहा – जे न मित्र दुख होहिं दुखारी तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना मित्रक दुख रज मेरू समाना।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता। ऐसे मित्र को तो देखने मात्र से भी पाप लग जाता है। असली मित्र तो वो होता है जो अपने पहाड़ से दुख को धूल बराबर और मित्र के धूल से दुख को सुमेरू पहाड़ के समान समझे।

19 दोहा – आगें कह मृदु वचन बनाई पाछे अनहित मन कुटिलाई।
जाकर चित अहिगत सम भाई अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जो व्यक्ति सामने बड़ा चढ़ाकर बोलते है और पीछे से मन में कपट को पालते है। इतना ही नहीं ऐसे व्यक्ति का मन मौका मिलते ही साँप के समान चाल भी टेढ़ी कर लेते है। इसलिए ऐसे मित्र का त्याग करने में देरी नहीं करनी चाहिए। इसी में ही स्वयं का हित हैं।

20 दोहा – सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।
धीरज धरहुं विवेक विचारी छाड़ि सोच सकल हितकारी।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है दुख में विलाप करना और सुख में अत्यंत खुश होने का काम केवल मूर्ख व्यक्ति करते है। जबकि धैर्यवान व्यक्ति दोनों ही परिस्थिति में समान भाव से रहते है और कठिन से कठिन समस्याओं का सामना डटकर करते है। अत्यंत बुरी स्थिति में भी अपने धैर्य का साथ नहीं छोड़ते और बिना चिंता करे अपने हित के कार्य में लगे रहते है। जिससे समस्या का समाधान मिल सके।

21 दोहा – तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ा बलवान।
भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है मनुष्य कोई बड़ा नहीं होता बड़ा तो समय होता है। क्योंकि समय की मार बहुत बलवान होती है। वो समय ही होता है जो व्यक्ति को बड़ा या छोटा बनाता हैं। जैसे एक बार जब अचूक धनुर्धर अर्जुन का समय खराब चल रहा था तब भिलों के हमले से भी गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए। जबकि अर्जुन भी वही था और उसका बाण भी वही था।

22 दोहा – तुलसी भरोसे राम के निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नही होनी हो सो होए।

अर्थ – तुलसीदास जी इस दोहे में यह कह रहे है अपने ईश्वर पर विश्वास कीजिए और बिना किसी डर के निश्चिंत होके चैन की नींद लीजिए। यह विश्वास कोई अनहोनी होने नहीं देगा और यदि कुछ अनिष्ट होना लिखा ही है तो वो होके रहेगा। इसलिए व्यर्थ की चिंता को छोड़िए और अपने कार्य को करते रहिए।

23 दोहा – मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।

अर्थ – तुलसीदास जी अपने भगवान राम से कह रहे है हे रघुवीर, मुझ जैसा दीनहीन कोई नहीं और तुम जैसा दीनहीनों का हित चाहने वाला इस संसार में कोई नहीं। इस विचार के कारण हे रघुवंश मणि मेरे जन्म-मरण के भयंकर दुख को दूर कर दीजिए।

24 दोहा – तुलसी इस संसार में भांति भांति के लोग।
सबसे हस मिल बोलिए नदी नाव संजोग।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है इस संसार में भिन्न-भिन्न स्वभाव और व्यवहार के लोग रहते है। इसलिए आप सबसे हँस के मिलिए और बोलिए। जैसे नौका नदी से दोस्ती कर बड़ी सरलता से उसे पार कर लेती है और अपनी मंजिल पा लेती है। वैसे ही आप भी अपने अच्छे आचरण से इस भवसागर को आसानी से पार कर सकते है।

25 दोहा – सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है देवता, मनुष्य और मुनि सबकी एक ही रीति होती है। सब अपने स्वार्थपूर्ति के कारण ही प्यार-प्रेम करते है। यानी की जब मतलब होता है तो वो सगे बन जाते हैं।

26 दोहा – करम प्रधान विस्व करि राखा।
जो जस करई सो तस फलु चाखा।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है ईश्वर ने इस धरा को कर्म प्रधान भूमि के रूप में बनाया है इसलिए ईश्वर ने संसार में कर्म को अत्यधिक महत्वता दी है। कहने का तात्पर्य यह है जो जैसा कर्म करता है उसे उसके अनुरूप ही फल भोगना पड़ता हैं।

27 दोहा – सो कलिकाल कठिन उरगारी।
पाप परायन सब नरनारी।

अर्थ – तुलसीदास जी ने इस दोहे में दूरदर्शिता को दर्शाते हुए यह कहा है की कलियुग का समय बहुत ही कष्टप्रद होगा। इस युग में सभी नर-नारी पाप कर्म में किसी ना किसी रूप से लिप्त होंगे।

28 दोहा – भए लोग सब मोहबस लेाभ ग्रसे सुभ कर्म।
सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउॅ कछुक कलिधर्म।

अर्थ – तुलसीदास जी ने कहा है कलियुग में सभी प्राणी मोहमाया के अधीन होंगे। अच्छे कर्मो को लोभ अपने वश में करेगा। लेकिन जो ईश्वर के भक्त है और अपने ईष्ट पर पूर्णरूप से विश्वास करते है उन्हें कलियुग के धर्मो को भी जानना और बचाना चाहिए।

29 दोहा – सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर, होहिं बिषय रत मंद मंद तर।
काँच किरिच बदलें ते लेहीं, कर ते डारि परस मनि देहीं।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते है जो मनुष्य जन्म को पाकर भी इस शरीर से प्रभु का सुमिरन नहीं करता और बुरे विषयों में लीन रहता है। वो उस मूर्ख के समान आचरण करता है जो पारस को पत्थर समझ फेंक देता है और काँच के टुकड़े को कीमती पारस मणि समझ हाथ में उठा लेता हैं।

30 दोहा – सोइ सयान जो परधन हारी, जो कर दंभ सो बड़ आचारी।
जो कह झूठ मसखरी जाना, कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।

अर्थ – तुलसीदास जी ने कहा है जो कलियुग में जो दूसरें के धन को कपट से छिनेगा वहीं होशियार और घमंडी अहंकारी के दिखावे को लोग अच्छे आचरण का समझेंगे। इतना ही नहीं झूठ बोल-बोल कर हँसी-मजाक करने वाले को लोग गुणी और बुद्धिमान समझेंगे।

दोस्तों, गोस्वामी तुलसीदास के दुर्लभ दोहे और उनका अर्थ हमने सरल भाषा में लिखने का पूरा प्रयास किया है। आशा है आपको यह दोहे बहुत पसंद आये होंगे और इन दोहों से आपको अपने जीवन को बेहतर बनाने में बहुत मदद मिलेगी।

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