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वेद क्या है और वेद कितने प्रकार के होते हैं?

आइये जागरूक पर जानते हैं वेद क्या है और वेद कितने प्रकार के होते हैं। वेदों से जुड़ी बहुत-सी बातें आपने भी जरूर सुनी होगी और शायद पढ़ी भी हो इसलिए आप ये जानते होंगे कि वेद पुरातन ज्ञान का ऐसा खज़ाना है जिसमें हमारी हर समस्या का समाधान छुपा है। वेदों में ईश्वर, देवता, ब्राह्मण, औषधि, ज्योतिष, गणित, रसायन, प्रकृति, भूगोल, इतिहास, रीति-रिवाज और धार्मिक नियमों जैसे सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान निहित है लेकिन अभी तक शायद आपको स्पष्ट रूप से वेद से जुड़ी जानकारी प्राप्त नहीं होगी और आप वेद के बारे में ज्यादा जानकारी लेना चाहते होंगे इसलिए आज हम आपको बताते हैं वेद और वेद के प्रकारों के बारे में, ताकि वेद से जुड़ी आपकी जिज्ञासा शांत हो सके और आपको वेद से जुड़े अपने सभी सवालों के जवाब मिल जाएँ। तो चलिए, जानते हैं वेद और वेद के प्रकारों के बारे में।

वेद क्या है और वेद कितने प्रकार के होते हैं?

वेद ‘विद्’ धातु से बना है और इसका अर्थ होता है ‘विदित होना’ और सामान्य भाषा में वेद का अर्थ होता है ‘ज्ञान।’ वेद दुनिया के प्रथम धर्मग्रन्थ है और इन्हीं के आधार पर दुनिया के सभी धर्मों की उत्पत्ति हुयी है। वेदों को श्रुति भी कहा जाता है क्योंकि वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाये गए ज्ञान पर आधारित है। मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज वेद ही माने जाते हैं यानी वेद पवित्र होने के साथ – साथ सबसे प्राचीनतम पुस्तक भी है।

वेद के 4 विभाग/प्रकार होते हैं:-

1. ऋग्वेद
2. यजुर्वेद
3. सामवेद
4. अथर्ववेद

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ऋग् को धर्म, यजु को मोक्ष, साम को काम और अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इनके आधार पर ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुयी है।

आइये, वेद के इन 4 प्रकारों के बारे में जानते हैं:–

1. ऋग्वेद:- ऋग्वेद सनातन धर्म का सबसे आरंभिक स्रोत है। ऋक का अर्थ होता है ज्ञान और स्थिति। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। इसमें 10 मंडल (अध्याय) हैं जिनमें 1028 सूक्त और 11 हजार मन्त्र हैं। ऋग्वेद में 33 देवी – देवताओं का वर्णन है और इंद्र को सबसे शक्तिशाली देवता माना गया है। इस वेद में एकेश्वरवाद, बहुदेववाद और एकात्मवाद का उल्लेख किया गया है। इस वेद की पांच शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। ऋग्वेद में जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानस चिकित्सा, सौर चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा की जानकारी दी गयी है। ये ग्रन्थ इतिहास की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है इसलिए ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को यूनेस्को ने सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है।

2. यजुर्वेद:- यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किये जाने वाले मन्त्र समाहित है। इसके अलावा यजुर्वेद में तत्वज्ञान यानी रहस्यमयी ज्ञान का वर्णन भी है। इस वेद में ऋग्वेद के 663 मन्त्र पाए जाते हैं। इसके बावजूद इसे ऋग्वेद से अलग माना जाता है क्योंकि ये मुख्य रूप से एक गद्यात्मक ग्रन्थ है और इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य और पद्य मन्त्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र प्रदेश में हुयी और इसका रचनाकाल 1400 से 1000 ई.पू. का माना जाता है।

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3. सामवेद:- साम का अर्थ संगीत होता है यानी सामवेद ऐसा ग्रन्थ है जिसके मंत्र गाये जा सकते हैं और ये एक संगीतमय ग्रन्थ है। इसमें मूल रूप से 99 मन्त्र हैं और शेष मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। इस ग्रन्थ में यज्ञ, अनुष्ठान और हवन के समय गाये जाने वाले मन्त्र शामिल हैं। सामवेद का प्रमुख देवता सूर्य है और इसमें सूर्य की स्तुति के मन्त्र ज्यादा हैं लेकिन इंद्र, सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन किया गया है। भारतीय संगीत के इतिहास में सामवेद का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। सामवेद में कुल 1875 ऋचाएं हैं जिनका गान सोमयज्ञ के समय ‘उदगाता’ करते थे। इस ग्रन्थ की तीन महत्वपूर्ण शाखाएं कौथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय हैं।

4. अथर्ववेद:- इस वेद की भाषा और स्वरूप के आधार पर ये माना जाता है कि इसकी रचना सबसे बाद में हुयी है। इस ग्रन्थ की रचना ‘अथवर्ण’ तथा ‘आंगिरस’ ऋषियों द्वारा की गयी है इसलिए इसे ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी कहा जाता है। इसके अलावा अथर्ववेद को ब्रह्मवेद, भैषज्य वेद और महीवेद भी कहा जाता है। इस वेद में कुल 20 काण्ड, 730 सूक्त और 5987 मन्त्र हैं और इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, चमत्कार, जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद जैसे विषयों का वर्णन है।

इन चारों वेदों के उपवेद भी हैं। उपवेद उन सभी विद्याओं को कहा जाता है जो वेद में निहित हो यानी उपवेद वेदों से ही निकले होते हैं। जैसे ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद उपवेद है। आयुर्वेद को धन्वंतरि ने ऋग्वेद से निकाला था, धनुर्वेद को विश्वामित्र ने यजुर्वेद से निकाला था, गंधर्ववेद को भरतमुनि ने सामवेद से निकाला था और स्थापत्यवेद को विश्वकर्मा ने अथर्ववेद से निकाला था।

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दोस्तों, अब आप वेद और वेद के प्रकारों के बारे में जानकारी पा चुके हैं। जागरूक टीम को उम्मीद है कि ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी और हमारे ज्ञान की धरोहर को जानने और समझने में मददगार भी साबित हो सकेगी।

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